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भगवंत मान सरकार के ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ अभियान के तहत नशे से उबर रहे युवाओं को नई ज़िंदगी देने में अहम भूमिका निभा रहे हैं पुस्तकालय

June 20, 2026By Short Daily News

पंजाब में नशे के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई में पुस्तकालय एक नए लेकिन बेहद प्रभावशाली हथियार बनकर उभर रहे हैं। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ अभियान के तहत सरकारी नशा मुक्ति एवं पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) केंद्रों में स्थापित पुस्तकालय नशे से उबर रहे लोगों को नशे की तलब से निपटने, मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने और रिकवरी के दौरान सकारात्मक दिनचर्या विकसित करने में मदद कर रहे हैं। इन पुस्तकालयों की स्थापना, नवीनीकरण और रखरखाव पंजाब के ‘लीडरशिप इन मेंटल हेल्थ प्रोग्राम’ के माध्यम से किया गया है। यह एक फ़ेलोशिप कार्यक्रम है, जो युवाओं को राज्य के नशा विरोधी अभियान से जोड़ता है। अब तक फ़ेलोज़ ने 10 ज़िलों के सरकारी केंद्रों में पुस्तकालय पहलों का समर्थन किया है और वर्ष के अंत तक 80 प्रतिशत से अधिक नशा मुक्ति एवं रिहैबिलिटेशन सेंटरों तक इस पहल का विस्तार करने की योजना है।

 

धार्मिक ग्रंथों, सिख इतिहास, साहित्य, कविता, जीवनी, पंजाबी संस्कृति और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पुस्तकों से सुसज्जित ये पुस्तकालय मरीज़ों को वह क्षमता वापस पाने में मदद कर रहे हैं, जिसे नशे की लत अक्सर छीन लेती है—ध्यान केंद्रित करने और आत्मचिंतन करने की क्षमता। बठिंडा स्थित सरकारी नशा मुक्ति एवं रिहैबिलिटेशन सेंटर में किताबें अब उपचार प्रक्रिया का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। मरीज़ अपने खाली समय में पढ़ने में रुचि ले रहे हैं और अक्सर एक-दूसरे से उन कहानियों पर चर्चा करते हैं, जिनमें उन्हें अपने जीवन की झलक दिखाई देती है।

 

बठिंडा स्थित पंजाब सरकार के नशा-मुक्ति केंद्र में कार्यरत काउंसलर सोमा ने बताया, “पहले यहाँ कोई पुस्तकालय नहीं था। यहाँ के डॉक्टर साहब ने पहल करके इसे शुरू किया। जब मरीज़ पढ़ना शुरू करते हैं तो उनका ध्यान दूसरी ओर लग जाता है। वे किताबों में इतने रम जाते हैं कि नशे की तलब कम होने लगती है। कहानियाँ, कविता और आत्मकथाएँ विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।” उन्होंने कहा कि पढ़ना नियमित काउंसलिंग सत्रों का एक महत्त्वपूर्ण पूरक बन गया है। उन्होंने कहा, “किताबें मरीज़ों को अपने जीवन और भविष्य के बारे में अलग ढंग से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। वे अधिक शांत होते हैं और रिकवरी पर चर्चा में सक्रिय रूप से भाग लेने लगते हैं। पढ़ने से उनके जीवन में सकारात्मकता लौटती है।” पुस्तकालयों का प्रभाव केवल बठिंडा तक सीमित नहीं है। अन्य रिहैबिलिटेशन सेंटरों में भी काउंसलरों ने देखा है कि मरीज़ पढ़ने की आदत के माध्यम से स्वस्थ दिनचर्या विकसित कर रहे हैं।

होशियारपुर स्थित पंजाब सरकार के नशा मुक्ति केंद्र में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट संदीप कुमारी ने बताया कि उन्होंने स्वयं किताबों के माध्यम से कई लोगों के जीवन में बदलाव देखा है। उन्होंने कहा, “हमने वर्ष 2016 में अपने घरों से किताबें लाकर पुस्तकालय की शुरुआत की थी। वर्षों तक नशे के कारण संवेदनहीन हो चुके मरीज़ धीरे-धीरे पुस्तकालय आने लगे। अधिकांश प्रेरणादायक किताबें पढ़ते थे, जिनसे उन्हें उबरने और दोबारा ध्यान केंद्रित करने में मदद मिली। इसी दौरान हमें पता चला कि कई लोगों को यह बुनियादी जानकारी भी नहीं थी कि नशे के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सुइयों से एचआईवी/एड्स फैल सकता है। हमारे पुस्तकालय में जीवनियाँ, धार्मिक पुस्तकें और नशा विरोधी साहित्य बेहद लोकप्रिय हैं। हालाँकि सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तक डॉ. नरेंद्र सिंह कपूर की ‘डूंघियां सिखरां’ है।”

 

सिख धर्म, सिख इतिहास, अध्यात्म और महान व्यक्तियों की जीवनियों से संबंधित पुस्तकें सबसे अधिक पसंद की जाती हैं। काउंसलरों का कहना है कि कई मरीज़ संघर्ष और कठिन दौर के बाद सफलता हासिल करने वाले लोगों की कहानियों की ओर विशेष रूप से आकर्षित होते हैं। ऐसी कहानियाँ उन्हें अपने जीवन से जुड़ी हुई महसूस होती हैं । केंद्र में उपचाराधीन एक मरीज़ ने बताया कि पढ़ना उसके लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। नथाना गाँव के परमिंदर सिंह (बदला हुआ नाम), जो वर्तमान में बठिंडा केंद्र में उपचाराधीन हैं, ने कहा, “मुझे सिख इतिहास और आत्मकथाएँ पढ़ना पसंद है। जब आप उन लोगों के बारे में पढ़ते हैं जिन्होंने कठिनाइयों का सामना किया और फिर भी जीवन में सफलता हासिल की, तो उससे हौसला मिलता है। मैंने हाल ही में उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान के बारे में पढ़ा, जो मुझे बहुत प्रेरणादायक लगा।”

 

मलेरकोटला के अब्बासपुरा निवासी बलदेव सिंह ने कहा कि पुस्तकालय ने उन्हें अपनी एक पुरानी आदत से दोबारा जोड़ दिया है। उन्होंने कहा, “मुझे विशेष रूप से डॉ. सतनाम सिंह संधू की किताबें पढ़ना पसंद है। पढ़ने से मेरा मन व्यस्त रहता है और मैं अपने लक्ष्य पर केंद्रित रह पाता हूँ।” काउंसलरों का कहना है कि ऐसे अनुभव अब लगातार देखने को मिल रहे हैं। जो मरीज़ शुरुआत में पढ़ने में रुचि नहीं दिखाते, वे धीरे-धीरे इसकी आदत विकसित कर लेते हैं। वे पहले छोटी और सरल किताबों से शुरुआत करते हैं और बाद में एक-दूसरे से किताबों का आदान-प्रदान करते हैं, पढ़ी हुई सामग्री पर चर्चा करते हैं तथा धर्म, इतिहास, कविता और अन्य विषयों में घंटों तक डूबे रहते हैं।

 

एक पन्ना पलटने की इस सरल प्रक्रिया के साथ, मुख्यमंत्री मान के ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ अभियान के तहत नशे से जूझ रहे अनेक लोग अपने जीवन का नया अध्याय भी शुरू कर रहे हैं।