मोदी सरकार ने संसद में एक अहम बिल पेश किया है, जिसने राजनीति में हलचल मचा दी है। इस बिल में प्रावधान है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री 30 दिन लगातार जेल में रहता है या हिरासत में रहता है और उस केस में कम से कम 5 साल की सज़ा का प्रावधान है, तो उन्हें तुरंत अपने पद से हटना होगा।
सरकार इसे anti-corruption move बता रही है, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक हथियार मानकर विरोध कर रहा है।
शशि थरूर ने तोड़ी पार्टी लाइन
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस बिल का समर्थन कर सबको चौंका दिया।
थरूर ने कहा:
“On the face of it, ये बिल reasonable लगता है। जो गलत करेगा, उसे सज़ा मिलनी चाहिए और वो constitutional या political office पर नहीं रह सकता। ये बात मुझे logical लगती है।”
उन्होंने कहा कि बिल को संसदीय समिति के पास भेजकर उस पर विस्तार से चर्चा करना अच्छा कदम होगा।
कांग्रेस नेताओं का विरोध
लेकिन कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने इस बिल को खतरनाक बताया है।
- प्रियंका गांधी (कांग्रेस सांसद, वायनाड):
उन्होंने इसे पूरी तरह तानाशाही (draconian law) कहा।
प्रियंका का तर्क है कि –
“कल को किसी भी मुख्यमंत्री को fabricated charges (झूठे केस) में फंसा कर 30 दिन जेल में रख दिया जाए और वो CM की कुर्सी से हट जाएगा, बिना किसी conviction (दोष साबित हुए)। ये बिल्कुल unconstitutional और undemocratic है।”
- के.सी. वेणुगोपाल (सीनियर कांग्रेस नेता):
उन्होंने कहा कि यह सिर्फ़ एक diversionary tactic है।
“ये बिल पास नहीं होगा। इसका मकसद सिर्फ़ electoral fraud और विपक्ष की गतिविधियों से लोगों का ध्यान हटाना है। सरकार vendetta politics को constitutional रूप देना चाहती है।”
- अभिषेक मनु सिंघवी (कांग्रेस प्रवक्ता):
उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी चुनावी मैदान में विपक्षी मुख्यमंत्रियों को नहीं हरा पा रही, इसलिए इस तरह का क़ानून लाकर उन्हें हटाना चाहती है।
बिल में क्या है खास?
- अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री 30 दिन तक जेल में रहते हैं, और जिस अपराध में उन पर केस है उसमें कम से कम 5 साल की सज़ा हो सकती है, तो उन्हें पद से हटना होगा।
- हालांकि, जेल से छूटने के बाद वही नेता दोबारा उसी पद पर नियुक्त हो सकते हैं।
- अभी के कानून (Representation of the People’s Act, 1951) में नियम है कि अगर किसी सांसद या विधायक को 2 साल या उससे ज्यादा की सज़ा हो जाती है, तभी वो अयोग्य ठहराए जाते हैं।
- यानी यह नया प्रस्ताव उससे कहीं ज्यादा सख़्त है।
राजनीतिक हलचल
यह बिल मानसून सत्र के आख़िरी दो दिन पहले पेश किया गया, जिससे संसद और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार इसका इस्तेमाल opposition leaders को टारगेट करने के लिए करेगी।
वहीं, समर्थक नेताओं का कहना है कि यह कानून राजनीति को clean और corruption-free बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
कुल मिलाकर, यह बिल अगर पास होता है तो भारतीय राजनीति का चेहरा बदल सकता है। लेकिन इसके लागू होने से पहले ही यह पक्ष-विपक्ष की जंग का नया मुद्दा बन गया है।