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UP में 22% Dalit Voters: Political Parties’ की होड़ और रणनीतियाँ

October 11, 2025By Short Daily News

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गर्मी बढ़ती जा रही है। इस बार राजनीति का मुख्य मुद्दा बन रहा है दलित वोट बैंक, जो प्रदेश की लगभग 22% आबादी को कवर करता है। कुल 403 विधानसभा सीटों में 86 आरक्षित सीटें हैं, जिनमें से 84 दलितों के लिए और 2 आदिवासियों के लिए हैं। लेकिन दलित वोटर्स सिर्फ आरक्षित सीटों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि 150 सीटों पर उनका निर्णायक असर भी है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगले चुनाव में जिस पार्टी के पाले में दलित वोट जाएंगे, वही सत्ता की कुंजी हासिल करेगी।

दलित वोटर का इतिहास और बदलता रुझान

पहले जाटव वोटर्स विशेष रूप से बसपा के पक्ष में एकजुट रहते थे। लेकिन 2017 के बाद, दलित वोटर्स भाजपा, सपा और बसपा में बंटते चले गए। 2022 के विधानसभा चुनाव में कई नॉन-जाटव दलित वोटर्स भाजपा गठबंधन की ओर झुके। इसका नतीजा ये हुआ कि भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में आई।

लेकिन बाद में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और संविधान के मुद्दों को लेकर नारों से कुछ दलित वोटर्स सपा की ओर चले गए। यही कारण रहा कि बसपा का वोट बैंक गिरकर 12% से 9.4% रह गया।

लोकनीति-सीएसडीएस सर्वे के अनुसार 2024 में:

  • सपा गठबंधन को नॉन-जाटव दलितों का 56% और जाटवों का 25% वोट मिला।
  • बसपा को जाटवों का 44% और नॉन-जाटवों का 15% वोट मिला।
  • बाकी वोट भाजपा गठबंधन को मिले।

पार्टियों की रणनीतियाँ

बसपा

बसपा के लिए दलित वोट बैंक अब भी अहम है। पार्टी कमजोर पड़ चुकी है, लेकिन इसे फिर से जोड़ने के लिए कांशीराम पुण्यतिथि पर बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया गया। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को सक्रिय किया ताकि युवा दलित वोटर्स को वापस लाया जा सके। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल का कहना है कि भारी भीड़ से साबित हुआ कि बसपा अब भी यूपी की सियासत में प्रासंगिक है।

सपा

सपा ने PDA गठबंधन के माध्यम से दलित वोटर्स को लुभाने की रणनीति अपनाई। पार्टी ने डॉ. अंबेडकर और कांशीराम जयंती पर कार्यक्रम आयोजित किए। साथ ही, अलग-अलग क्षेत्रों में दलित नेताओं को आगे बढ़ाकर वोटर्स को आकर्षित करने का प्रयास किया। सपा प्रवक्ता आजम खान कहते हैं कि सपा दलितों को उचित सम्मान और प्रतिनिधित्व देना चाहती है।

भाजपा

भाजपा ने पहली बार वाल्मीकि जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया। इसके साथ ही पूरे प्रदेश के मंदिरों में 24 घंटे का अखंड पाठ और कई कार्यक्रम आयोजित किए। भाजपा सफाईकर्मियों के लिए मानदेय बढ़ाना, बीमा कवर और आवास जैसी योजनाएँ लेकर सामने आई। लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी और प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने सपा शासन में हुए दलित अत्याचारों पर निशाना साधा।

कांग्रेस

कांग्रेस भी दलित वोटर्स को अपने पाले में लाने में सक्रिय है। हाल ही में हरिओम वाल्मीकि हत्या केस को लेकर कांग्रेस ने कैंडल मार्च निकाला और सोशल मीडिया पर भाजपा पर हमला किया। प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी नेता अविनाश पांडे और अजय राय ने विभिन्न कार्यक्रमों और श्रद्धांजलि समारोहों के माध्यम से दलितों के मुद्दों को प्रमुखता दी।

विश्लेषण

  • यूपी में पूर्वांचल और बुंदेलखंड इलाकों में दलित वोटर्स की संख्या ज्यादा है, इसलिए ये क्षेत्र चुनाव में निर्णायक होंगे।
  • बसपा अपनी स्थापित पहचान और मायावती के नेतृत्व के दम पर वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है।
  • सपा PDA गठबंधन और स्थानीय दलित नेताओं के जरिए वोटर्स को जोड़ने में लगी है।
  • भाजपा सरकारी योजनाओं और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए लुभाने की कोशिश कर रही है।
  • कांग्रेस दलितों के अधिकार और न्याय के मुद्दों को उठाकर समर्थन जुटाने में लगी है।

यूपी के अगले विधानसभा चुनाव में दलित वोटर्स की भूमिका बेहद निर्णायक होगी। जिस पार्टी के पास यह वोट बैंक होगा, वही सत्ता की कुंजी अपने हाथ में रखेगी।