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कोहली की खुलेआम पैरवी ने सिख हृदयों को गहरी चोट पहुंचाई: Prof. Sarchand Singh Khayala

January 4, 2026By Short Daily News

सिख चिंतक एवं पंजाब भाजपा के प्रवक्ता प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने 328 पावन स्वरूपों के मामले को लेकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और बादल नेतृत्व पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि इस संवेदनशील मामले में गिरफ्तार सतिंदर सिंह कोहली की खुलेआम पैरवी कर बादल नेतृत्व न केवल कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है, बल्कि सिख भावनाओं को भी गहरी ठेस पहुंचा रहा है।

प्रो. ख्याला ने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है कि सुखबीर सिंह बादल का करीबी होने के कारण सतिंदर सिंह कोहली को बचाने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाया जा रहा है। खुले मंच से उसके पक्ष में खड़े होकर हर ‘लक्ष्मण रेखा’ पार की जा रही है, जो सिख समुदाय के लिए असहनीय है। उन्होंने कहा कि सिख संगत इस पूरे मामले पर जवाब चाहती है।

उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2020 में ईश्वर सिंह समिति की जांच रिपोर्ट में 328 पावन स्वरूपों की कमी सामने आई थी। इसके बावजूद, बीते पांच साल चार महीने में शिरोमणि कमेटी इन पावन स्वरूपों की तलाश के लिए एक भी ठोस कदम उठाने में विफल रही है। न तो यह बताया जा सका कि ये पावन स्वरूप कहां गए और न ही उनकी स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी दी गई।

प्रो. ख्याला ने कहा कि हाल ही में श्री अकाल तख्त साहिब से पांच सिंह साहिबान द्वारा प्रचारकों और विज्ञापनों के माध्यम से लापता पावन स्वरूपों की तलाश के आदेश इस बात का प्रमाण हैं कि न तो शिरोमणि कमेटी और न ही अकाल तख्त सचिवालय के पास इस गंभीर मामले से जुड़ी कोई ठोस जानकारी है। यह स्थिति शिरोमणि कमेटी की पूर्ण विफलता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर करती है।

उन्होंने कहा कि चवर तख्त के मालिक श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति इस तरह की असंवेदनशीलता यह दर्शाती है कि शिरोमणि कमेटी और बादल नेतृत्व अपने पंथक दायित्वों से पूरी तरह भटक चुके हैं। अकाल तख्त साहिब को ढाल बनाकर दी जा रही सफाइयों से सच्चाई नहीं छुपाई जा सकती। वास्तविकता यह है कि इन लोगों ने सिख संगत का भरोसा, नैतिक अधिकार और प्रतिष्ठा खो दी है।

प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने सवाल उठाया कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को अपने अधिकारों का तो पूरा ज्ञान है, लेकिन क्या वह जानबूझकर अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रही है? उन्होंने कहा कि सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 के तहत प्राप्त अधिकारों का हवाला बार-बार दिया जाता है, लेकिन उसी अधिनियम के तहत निर्धारित कर्तव्यों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि गुरुद्वारा अधिनियम की धारा 142 के अनुसार शिरोमणि कमेटी, उसके अध्यक्ष, सदस्य और कर्मचारी किसी भी प्रकार की लापरवाही, कर्तव्यहीनता या विश्वासघात के मामले में कानून से ऊपर नहीं हैं। ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार सिख गुरुद्वारा न्यायिक आयोग को है और अंतिम जवाबदेही उच्च न्यायालय तक जाती है।

प्रो. ख्याला ने कहा कि यह मामला उच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत दर्ज पुलिस केस से जुड़ा हुआ है। इसलिए शिरोमणि कमेटी और बादल नेतृत्व को यह समझना होगा कि वे केवल पंथक रूप से ही नहीं, बल्कि कानूनी रूप से भी अदालत के प्रति जवाबदेह हैं।

उन्होंने यह भी गंभीर प्रश्न उठाया कि 27 अगस्त 2020 को श्री अकाल तख्त साहिब के आदेशानुसार पारित प्रस्ताव संख्या 466, जिसमें दोषियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का निर्णय लिया गया था, उसे बाद में प्रस्ताव संख्या 493 के जरिए रद्द कर केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित कर देना क्या अकाल तख्त साहिब के आदेशों का सीधा उल्लंघन नहीं है?

अंत में प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने कहा कि बादल नेतृत्व यह भ्रम पाल बैठा था कि पावन स्वरूपों की कमी की भरपाई धन से कर दी जाएगी, लेकिन जांच आयोग की रिपोर्ट पहले ही साफ कर चुकी है कि ऐसी सोच रखने वालों के लिए संदेश स्पष्ट है—
“आप मालिक के घर बख्शे नहीं जाएंगे।”