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मणिपुर एक साल से जल रहा है… उस पर ध्यान कौन देगाः Bhagwat

June 11, 2024By Short Daily News

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख डॉ. मोहन Bhagwat ने मणिपुर हिंसा और लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के रवैये पर कई बड़ी बातें कही हैं। नागपुर में संघ कार्यकर्ताओं के विकास वर्ग कार्यक्रम के समापन पर Bhagwat ने कहा, ‘एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। इससे पहले 10 साल शांत रहा और अब अचानक जो कलह वहां पर उपजी या उपजाई गई, उसकी आग में मणिपुर अभी तक जल रहा है, त्राहि- त्राहि कर रहा है। इस पर कौन ध्यान देगा? प्राथमिकता देकर उसका विचार करना यह कर्तव्य है।’ गौरतलब है कि मणिपुर हिंसा में 200 से ज्यादा मौतें हुई हैं और 50 हजार लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं।

चुनाव प्रचार में मर्यादा टूटने का जिक्र करते हुए डॉ. Bhagwat ने कहा, चुनाव में जो कुछ हुआ उस पर विचार करना होगा। देश ने विकास किया है, लेकिन चुनौतियों को भी न भूलें। सहमति से देश चलाने की परंपरा का सभी स्मरण रखें। उन्होंने कहा, ‘जब भी चुनाव होता है, मुकाबला जरूरी होता है। इस दौरान दूसरों को पीछे धकेलना भी होता है, लेकिन इसकी एक सीमा होती है। यह मुकाबला झूठ पर आधारित नहीं होना चाहिए। इस बार चुनाव ऐसे लड़ा गया, जैसे यह युद्ध हो।

अनावश्यक रूप से आरएसएस जैसे संगठनों को इसमें शामिल किया गया। तकनीक का उपयोग करके झूठ फैलाया गया, सरासर झूठ। क्या तकनीक और ज्ञान का मतलब एक ही है? जिस तरह चीजें हुईं, जिस तरह से दोनों पक्षों ने कमर कसकर हमला किया, इससे विभाजन होगा। सामाजिक व मानसिक दरारें बढ़ेंगी।’

जो मर्यादा का पालन करे, अहंकार न करे, वही सही सेवक
भागवत ने कहा, जो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मर्यादा की सीमाओं का पालन करता है, जो अपने काम पर गर्व करता है, फिर भी अनासक्त रहता है, जो अहंकार से रहित होता है, ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में सेवक कहलाने का हकदार है। काम करें, लेकिन मैंने किया यह अहंकार ना पाले तो हम इस देश की सच्ची सेवा कर रहे हैं ऐसा होगा।

विपक्ष को विरोधी नहीं, प्रतिपक्ष कहना ही सही
भागवत ने कहा, संसद में दो पक्ष जरूरी हैं। देश चलाने के लिए सहमति जरूरी है। संसद में सहमति से निर्णय लेने के लिए बहुमत का प्रयास किया जाता है, लेकिन हर स्थिति में दोनों पक्ष को मर्यादा का ध्यान रखना होता है। संसद में किसी प्रश्न के दोनों पहलू सामने आएं, इसलिए ऐसी व्यवस्था है। विपक्ष को विरोधी पक्ष की जगह प्रतिपक्ष कहना चाहिए।